भीतर का मौन ही ईश्वर की भाषा है"जब आपके मन की व्यर्थ इच्छाएँ और शोर शांत हो जाते हैं, तब उस गहरे मौन में ईश्वर की उपस्थिति और मार्गदर्शन का अनुभव अपने आप होने लगता है।"