मनुष्य का शरीर ही सबसे बड़ा मंदिर है और श्वास (breath) वह सेतु है जो हमें परमात्मा से जोड़ती है। बाहरी कर्मकांड तब तक व्यर्थ हैं जब तक हम अपने भीतर के 'अंधकार' (क्रोध, लोभ, मोह) को नहीं पहचानते। मौन में बैठकर खुद को जानना ही सच्ची प्रार्थना है।
View this post in the app Get Snivogram on Google Play